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Monday, 1 September 2014

"मोहब्बत का अखबार"

हर रोज़ सुबह ताज़ी ख़बरों के साथ आते अखबार की तरह
आज ये हवाएं तम्हारी एक नईं याद ले आयीं

और देखते ही देखते तम्हारा धुंदला सा चेहरा सामने आ गया

अखबार में छपी उन BOLD HEADLINES की तरह
तम्हारी उन गहरी आँखों पे मैं ज़रा ठहर सा गया

EDITORIAL में छपी उन गहरी बातों की तरह ,
अपने अन्दर उठे हुए इस एहसास को समझने की कोशिश करने मैं लग गया

कुछ वक़्त लगा पर OPINION वाले पेज की तरह कुछ कुछ समझ में आ रहा था

धीरे धीरे ही सही पर  PUBLIC FEEDBACK  की तरह
कई सवाल, कुछ जवाब

और कुछ उमीदें उन PAID ADVERTISEMENT जैसी की तम्हारे इस एहसास को
ओझल करने लग्ग गयी

किसी SPORTS PAGE पे छपी उन जीत और हार की ख़बरों की तरह ,

मेरा मन भी खुशी और गम के उस BORDER पे आ खड़ा हुआ था

डर गया था शायद मैं, इस लिए तुरंत
एक पुरे पढ़े हुए अखबार की तरह

आज फिर तम्हारी यादों को यहीं बंद कर रहा हूँ
कल फिर खोलूँगा और महसूस करूँगा इनको

शायद अगले दिन    के अखबार की तरह
कोई नया जवाब लेके , कल फिर ये आ जायें


तम्हारी यादों से भरे हुए उस पिटारे को बंद तो किया

पर तब तक इतना तो  इतना तो sure हो गया था


की ये "मोहब्बत का अखबार" था
ohh sorry ऐतबार था

Sunday, 20 July 2014

(Part 1) *** शुरुआत ***



साथ के लड़कों के साथ,आज जब खड़े क्लास में बतिया रहे थे,
किसी के आने का एह्साह हुआ,तो unconsciously मुड़के देख लिया,
तुमने शायद धयान न दिया हो,पर इतने में यहाँ तो जैसे धरती ने rotation ही बंद कर दिया

एक ही जगह अटकी आँखों में दर्द हुआ तो ध्यान आया की तुम्हे एक तक देखे जा रहा हूँ|
वाह! beautiful, इतना shocked तो केन्या के WC semifinal में पहुचने पे नहीं हुए थे
कल तक तो हम खुद को COOL समझते ही थे, आज अचानक हाथ पाँव ठन्डे पड़ गए
अक्सर ऐसी situation में आशिक के लिए वक़्त भी गुड फ्रेंड बन के रुक जाता है
तो आवाज़ हमनें भी  दे दी,  लेकिन ससुरा यहाँ वक़्त क्या खून भी NFS हो गया|

हमनें सोचा भी, अमें छोड़ो, है तो ये वही रोज़ वाली,बवाल हो जाएगा
पर वही जिद्द,  अपने आप को chuck Norris से कम भी कहाँ समझते हैं, तो ऐसे कैसे ताल देते
२ गाली सुनने की हिम्मत बाँधी, और पूरी शरीर की threshold को तोड़ते हुए, कह दिया
“तुम आज बहुत मस्त लग रही हो, बहुत मस्त”
उम्मीद शायद तुमने भी नहीं की थी,की ये मुआ भी तारीफ़ कर सकता है
नतीजन तुमने Emotions  में  Blush किया और यहाँ गंगोत्री से गंगा निकल पड़ी
अब threshold टूट ही चुका था तो १ नहीं,२ नहीं,5 नहीं
ना जाने कितनी बार क़द्रदानी करते रहे, और तुम इस बेबाकी को हर बार सुन कर मुस्कुराती रही |


BHAA_GAYI_AAJ_TUM


stay with me in this and move to Part 2

Friday, 27 December 2013

*** इंसानियत ***



yet another stupid poem or what ever you may call it


मेरी आवाज़ में आवाज़ मिलाते रहिये |

हमने कल रात जलाये थे जो दिए ,
उनकी लौ की रख को हटाते रहिये  |

नींद आती है तो तक़दीर भी सो जाती  है |
कोई अब सो ना सके, वह गीत गाते रहिये |

भूखा सोने को तैयार है मेरा यह देश ,
आप परिंदे के ख़ाब उसे दिखाते रहिये  |

वक्त के हाथ में फूल भी है, पत्थर भी है  |
चाह फूलों की है तो पत्थर भी खाते रहिये  |


जाने कब आखिरी खत, आपके नाम आ जाये,
आपसे जितना बन सके अनुराग लुटते रहिये  |

समय ने जब भी अँधेरे से दोस्तीं की है ,
जला के अपना घर , हमने रौशनी की है  |

हाँ तुम, " मेरी भावनाओ को " और आप
भी इसी तरह मेरी भावनाओ को पढते , सुनते  रहिये   |

मेरी आवाज़ में आवाज़ मिलाते रहिये ,
भावनाए अगर दिल तक पहुचे तो अपनी समझ अपनाते रहिये,
और अगर दिल तक पहुंची तो अगले कुछ पल तक मुस्कुराते रहिये  |



Saturday, 27 July 2013

ज़िन्दगी क्या है ?



forgive me guys, if you don't like it, it was a amateur piece, i wrote it long back just for fun.



ज़िन्दगी क्या है?
किस्से पूछूं?

शायद कुछ सांसें जो हवा से मिल गयी
कुछ शब्द जो होठो तक आ नहीं पाए
कुछ आंसूं जिनकी नुमाइश हम कर ना सके
कुछ शख्स जो घर कर गए है दिल में

या शायद 

कुछ चंद पल ही हैं जो बार बार आते है
उनके हालात भी एक से ही होते है
उनका एहसास भी एक सा ही होता है
सिर्फ आइना बदलता है हमारा
साथ में अगर कुछ बदलता है तो वो है वक़्त

या

फिर कोई उत्सव है ज़िन्दगी
ईद या दिवाली जैसा
ग़म हो चाहे जितने हर
त्यौहार में उन्हें छुपा लेते है हम
ज़िन्दगी में तकलीफ हो चाहे जितनी खुद को संभाल लेते है हम
गर उत्सव ना होती ज़िन्दगी
अँधेरे में चिराग ढूढने की
चाहत कैसे रख पाता ये मन

असल में ज़िन्दगी की परिभाषा कहूँ तो
कुछ फूलों से बना आशियाना है
जिस में दफन है
दिन कुछ बेकरारी के,
थोड़ी से तन्हाई के

किसी की 2 पल की झलक पाने की ख्वाइश के
1 बुझती लौ को सँभालने की आस के
कुछ बन्ने की चाहत के
किसी अनुराग से मिलने की बेकरारी के

जीते तो हम ज्यादा या कम इन्ही पलों को है
जो इससे ज्यादा जीते है
वो मरने के बाद भी ज़िन्दगी जीते है
जो इससे कम जीते है
उन्हें ज़िन्दगी जीना सिखा देती है|